गीता ईश्वर के प्रति अनुराग और जीवन का गीत है
Wednesday, 29 March 2017
Sunday, 25 March 2012
गीता ईश्वर के प्रति अनुराग और जीवन का गीत है
"माम अनुस्मर युध्य च "
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं - "माम अनुस्मर युध्य च".
श्रीमद्भगवद्गीता लोकमान्य ग्रन्थ है .
गीता में अध्यात्म, योग, धर्म, ईश्वर के प्रति अनुराग, उसका सूक्ष्म और विराट दर्शन, कर्म की महत्ता, भक्ति-ज्ञान-वैराग्य का सूक्ष्म विवेचन और मोक्ष प्राप्ति का अतुलनीय वर्णन है. गीता का गान जिस स्थिति में, जिस वातावरण में जिस संयोग में हुआ इस में अलग अलग कहना आवश्यक नहीं है क्योकि यह सब लोग जानते हैं . इस पवित्र ग्रन्थ में प्रक्षेपित प्रत्येक अक्षर प्रत्येक शब्द और प्रत्येक पद अवैकल्पिक एवं सर्वकालिक सत्य है.गीता का उद्घोष समर भूमि के मध्य में हुआ .प्रथम श्लोक के प्रथम पद कह है "धर्म क्षेत्रे कुरुक्षेत्रे "अतः इस संसार को सर्व प्रथम धर्माचरण, धर्म संस्थापना, एवं धर्म के स्वरुप का प्रतिपादन करते हुए इश्वर की परम सत्ता का बोध कराना है . धर्म की व्याख्या उसके मूल एवं सूत्रों की विवेचना हमारा वर्तमान विषय नहीं है. हम केवल धर्म के इस प्रसंग को वर्णाश्रम धर्म का आश्रय मात्र लेंगे .प्रातः स्मरणीय परम भागवत गोसाई जी ने मानस में इस जटिल विषय को सरल शब्दों में निरुपित किया है- "वर्णाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग ". यहाँ भी धर्म का संकेत "कर्म्विबगश:" अपने अपने वर्ण के अनुरूप अपने अपने कर्मों में रत रहना ही है . वर्णाश्रम धर्म समाज के सञ्चालन की सुद्रढ़ व्यवस्था रही है इसी के चलते भारतवर्ष विश्व में शीर्षस्थ हुआ था.इसमें समस्त सामाजिक आवश्यकता तथा सर्वजन हिताय उद्धेश्यों का निर्विकल्प आश्रय विद्यमान है . गीता धर्म और कर्म के सम्यक परिपालन की आचारसंहिता है एवं अतुलनीय सामंजस्य है, नियमन है, अनुशासन है एवं मोक्ष दायिनी है . यह पापों को विगलित करने वाली स्रोतस्विनी है, ईश्वर में अनुरक्ति जगाती है . यह अकर्मण्यता को नष्ट कर पुरुष का पुरुषार्थ जगाती है . रणभूमि में गाड़ीव धरी वीर अर्जुन जब विमूढ़ होता है, कर्मो से भीरु होता है तब भगवान के श्री मुख से उच्चरित गीता उसमे प्राण और पुरुषार्थ का संचार करती है . वस्तुतः गीता संसार से भागने का नहीं अपितु कर्म के भाव स्थापित करती है. गीता कर्म करना अनिवार्य बताती है लेकिन कर्म फल में लिप्तता से बचाती है. इसे सीधे उदहारण में समझें तो गीता मानव जीवन को कमल के सध्र्श रखना सिखाती है. कमल सनातन संस्कृति में आदर्श माने गया पुष्प है. कमल की उत्पत्ति और पोषण कीचड से है एवं जहाँ कमल का मूल है. इसे अध्यात्म जगत 'संसार' संकेत करता है . कमल नाल जल की तरलता, उसकी शीतलता में रहता है. यह तरल माध्यम ही ईश्वर की करुणा उसकी कृपा और उसकी असीम सत्ता है . जल की तरलता ईश्वर का आलंबन है. जल की सतह पर पुष्प और पत्र स्थित रहते हैं . समग्र रूप से देखें तो कमल तीन अलग अलग माध्यमों रहते हुए जीवंत रहता है. पत्र और पुष्प बाह्य जगत में कमल का दृष्टव्य रूप है. इसीलिए मैं कहता हूं कमल उस सृष्टिकर्ता की अप्रतिम कृति है. माँ भगवती कमलासना है. भगवान के दिव्या स्वरुप का जब मनोहारी रूप वर्णन किया जाता है तो सरोज, कमल, इत्यादि से उपमान दिया जाता है. कमल का पुष्प और पत्र भाग का यहाँ आश्रय ले कर हम कुछ समझने का प्रयत्न करेंगें . इन अवयवों पर जब जल की बूँदें पड़ती है तो वह इसे यथावत धारण करता हें जो अलग भी नहीं है और अलग भी है, लिप्त नहीं है.
प्रसंग है_ कुरुक्षेत्र में सेना युद्ध के लिए उद्यत हो कर खड़ी है अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा दोनों सेनाओं के बीच रथ को ले चलो. सारथि ने वैसा ही किया. अर्जुन ने देखा युद्ध में उपस्थित दोनों पक्षों में जो थे वे सब अपने या अपनों में से ही है. अर्जुन विमोहित हुआ उसके हाथ से गांडीव गिर गया. युद्ध सारा वृत्तान्त सब को पता है. इस सन्दर्भ में एक श्लोक का पदांश याद अत है _"मामनुस्मर युध्य च ". यह पदांश अपने आप में एक जीवन दर्शन समेटे है. गीता ईश्वर की असीम सत्ता, ईश्वर का सत्य स्वरुप, ईश्वर की करुणा का आभास कराती है एवं उसी समय कर्म का पाठ भी पढ़ाती है, मानव जीवन को जीने की कला सिखाती है, जीवन के यथार्थ बोध साथ ईश्वर की स्मृति का संयोग कराती है. मनुष्य यदि कमल के जीवन को अपने जीवन में व्याहृत करे तो समस्त सम- विषम परिस्थितियों में सम रह कर अकम्पित जीवन जी सकता है
जीवन की सफलता का भौतिक मापदंड वस्तुतः वास्तविक मानदंड नहीं है वरन अपना कर्म करने के साथ साथ अध्यात्म का आश्रय पाना , ईश्वर की सत्ता की अनुभूति करना, उनकी कृपा में रहना, तथा उनके प्रति कृतज्ञ होना है. समस्त धर्मानुरागी एवं विद्वद्जनों से मैं क्षमा प्रार्थी हूं , मैं इस संदर्भ की व्याख्या अपने अपरिपक्व अनुभव से कर रहा हूँ
कहते हैं - "नजर बदली तो नज़ारे बदल जाते हैं, थोड़े नहीं सारे बदल जाते हैं ." गीता भगवान के श्रीमुख से निस्रत हुई इसलिए तर्कों से परे है, संशय के योग्य नहीं है. 'श्रद्धावान्लाभ्तेज्ञान ' इसलिए जिसकी जैसी नजर,जिसकी जैसी श्रद्धा और जिसकी जैसी समझ इसे माना इसे जाना और इससे पाया. गीता का निरूपण महाभारत के रणांगन में हुआ. मेरे संज्ञान में इसे तीन व्यक्तियों ने सुना. एक अर्जुन ने जो कृष्ण का सखा है, उसने सखा रूप में भगवान कृष्ण को स्वीकार कर समर्पण भाव से सुना. उसे ज्ञान एवं ब्रह्मविद्या का श्रवण करते हुए परम पुरुष के विराट स्वरुप दर्शन किया . गीता के श्रवण करके उसका मोह भंग हुआ. अपने कर्म में श्रद्धा से तत्पर हुआ और अंत में विजय श्री और यश प्राप्त किया . दूसरा संजय ने सुना, जिसने भगवान वेदव्यास की कृपा से दिव्य दृष्टि से देखा सुना. इसने यथा रूप राजा ध्रतराष्ट्र को सुनाया, संजय ने माध्यम हो कर इस पुण्य दायिनी, मोक्ष दायनी गीता को ध्रतराष्ट्र तक पहुँचाया. क्योकि इसे संजय ने हस्तांतरित किया था जसे अंजलि में सुगन्धित पुष्पों के छूने से शुची सुगंध रह जाती है उसी प्रकार ईस्वर की उसे कृपा प्राप्त हुई. गीता के ह्रदय से श्रवण करने पर उसे ज्ञान तो मिला ही वह त्रिकालग्य हुआ. गीता के अंतिम श्लोक में स्वयम संजय ने निश्चयात्मक अधिघोष्णा की.- "यत्र योगेश्वरो कृष्ण: यात्रा पार्थो धर्नुधर: तत्र श्रीर्विजय: भूति: नीतिर्मतिर्मम. " इसे मैं उद्घोषणा इस कारन से कह रहा हूँ क्योंकी युद्ध आरम्भ होने के पूर्व ही युद्ध अर्थत कर्म फल की परिणीती स्पष्ट कर दी थी. इसके प्रतिकूल राजा ध्रतराष्ट्र ने पूरे संवाद में केवल छिद्रान्वेषण ही किया. उसने भगवन के सर्वव्यापक स्वरुप को अनुभूत नहीं किया क्योंकि उसमें समर्पण, परमार्थ और जन कल्याण की भावना का सर्वथा अभाव था. सत्य है निम्ब के वृक्ष के जड़ में मधु का सिंचन करने पर भी उसमे मिठास नहीं आती है. इस परम पवित्र गीता की स्रोतस्विनी आज तक इस संसार में बह रही है और हमारे कल्याण के हेतु से विद्यमान है.
'नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन
यमेवैष वृणुते तें तें लभ्यः तस्यैष आत्मा वृणुते तनुं स्वाम.
यह परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से न बुद्धि से, और न ही बहुत सुनने से ही प्राप्त होता है. जो परमात्मा को स्वीकार कर लेता है वह परमात्मा को प्राप्त करता है और परमात्मा उसके सामने स्वयं प्रकट कर देता है.
ईशावाश्योप्निषद में कहा है -
ईशावाश्यमिदम्सर्वं यात्किन्चिद्जगात्याम्जगत.
तेन त्यक्तेन भुन्जिथाम माँ गृधः कस्यस्विद्धनम .
अखिल ब्रह्माण्ड जो कुछ भी जड़ चेतन स्वरुप जगत हैयह समस्त ईश्वर से व्याप्त है. इस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्याग पूर्वक भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ.यह धन (भोगी पदार्थ ) किसका है? अर्थात किसी का नहीं.समस्त भौतिक पदार्थ उस परमात्मा का वैभव है हमारी धरोहर नहीं.उसकी सत्ता का अनुभव करोऔर उसका यथोचित उपभोग करो. मत भूलो उस सृष्टिकर्ता ने जिस सृष्टि की रचना की तुम उसके अवयव . न तुम सृष्टि से अलग हो न सृष्टि तुम से अलग है. वह परमात्मा समरूप से सब में विद्यमान है और यह सम्पूर्ण भी उसमें ही अवस्थित है .
मानसकार कहता है- हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रगट होही मैं जाना
लेकिन _सोई जानई जेहू देई जनाई जानत तुम्हहि तुम्हहि होई जाई.
कहें तो उपरिलिखित तथ्यों को यदि किंचत मात्र भी जीवन में उतार लिया तो हमारे जीवन को जीने की सोच में विलक्षण अपरिवर्तन आ सकता है.
संक्षिप्त रामायण
जाको पढ़े पार हो जाई जगं में रामायण सुखदाई
बालकाण्ड हरी जन्म लियो है नर लीला फैलाई
जाई जनकपुर धनुष को तोडा ब्याहे चारों भाई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
अयोध्या कांड में मात पिता की आज्ञा शीश चढ़ाई
सिया सहित प्रभु वन को गए हैं राम लखन दोउ भाई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
अरण्य कांड में सीता हरण हुआ पंचवटी में जाई
पम्पापुर में मिले पवनसुत सुग्रीव से करी मिताई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
किष्किन्धा कांड में चार महीना वर्षा ऋतू बिताई
शरद ऋतू आते ही प्रभुजी सिया जी की खोज कराई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
सुन्दर कांड में लंका जलाई अक्षय को मार गिराई
मात सिया की खबर सुनाई कृपा सिन्धु रघुराई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
लंका कांड में सेतु बंध हुआ सेना पार लगाई
घोर संग्राम मच्यो लंका में जीत गए रघुराई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
उत्तर कांड में राज तिलक हुआ राज करे दोउ भाई
सिया सहित सिंहासन बैठे राम लखन दोउ भाई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
सात कांड जो नर पढ़े सुने मन और चित लाई
तुलसीदास आशा रघुवर की भाव सागर तर जाई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
-: दुर्गा सोनी :-
गीता में अध्यात्म, योग, धर्म, ईश्वर के प्रति अनुराग, उसका सूक्ष्म और विराट दर्शन, कर्म की महत्ता, भक्ति-ज्ञान-वैराग्य का सूक्ष्म विवेचन और मोक्ष प्राप्ति का अतुलनीय वर्णन है. गीता का गान जिस स्थिति में, जिस वातावरण में जिस संयोग में हुआ इस में अलग अलग कहना आवश्यक नहीं है क्योकि यह सब लोग जानते हैं . इस पवित्र ग्रन्थ में प्रक्षेपित प्रत्येक अक्षर प्रत्येक शब्द और प्रत्येक पद अवैकल्पिक एवं सर्वकालिक सत्य है.गीता का उद्घोष समर भूमि के मध्य में हुआ .प्रथम श्लोक के प्रथम पद कह है "धर्म क्षेत्रे कुरुक्षेत्रे "अतः इस संसार को सर्व प्रथम धर्माचरण, धर्म संस्थापना, एवं धर्म के स्वरुप का प्रतिपादन करते हुए इश्वर की परम सत्ता का बोध कराना है . धर्म की व्याख्या उसके मूल एवं सूत्रों की विवेचना हमारा वर्तमान विषय नहीं है. हम केवल धर्म के इस प्रसंग को वर्णाश्रम धर्म का आश्रय मात्र लेंगे .प्रातः स्मरणीय परम भागवत गोसाई जी ने मानस में इस जटिल विषय को सरल शब्दों में निरुपित किया है- "वर्णाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग ". यहाँ भी धर्म का संकेत "कर्म्विबगश:" अपने अपने वर्ण के अनुरूप अपने अपने कर्मों में रत रहना ही है . वर्णाश्रम धर्म समाज के सञ्चालन की सुद्रढ़ व्यवस्था रही है इसी के चलते भारतवर्ष विश्व में शीर्षस्थ हुआ था.इसमें समस्त सामाजिक आवश्यकता तथा सर्वजन हिताय उद्धेश्यों का निर्विकल्प आश्रय विद्यमान है . गीता धर्म और कर्म के सम्यक परिपालन की आचारसंहिता है एवं अतुलनीय सामंजस्य है, नियमन है, अनुशासन है एवं मोक्ष दायिनी है . यह पापों को विगलित करने वाली स्रोतस्विनी है, ईश्वर में अनुरक्ति जगाती है . यह अकर्मण्यता को नष्ट कर पुरुष का पुरुषार्थ जगाती है . रणभूमि में गाड़ीव धरी वीर अर्जुन जब विमूढ़ होता है, कर्मो से भीरु होता है तब भगवान के श्री मुख से उच्चरित गीता उसमे प्राण और पुरुषार्थ का संचार करती है . वस्तुतः गीता संसार से भागने का नहीं अपितु कर्म के भाव स्थापित करती है. गीता कर्म करना अनिवार्य बताती है लेकिन कर्म फल में लिप्तता से बचाती है. इसे सीधे उदहारण में समझें तो गीता मानव जीवन को कमल के सध्र्श रखना सिखाती है. कमल सनातन संस्कृति में आदर्श माने गया पुष्प है. कमल की उत्पत्ति और पोषण कीचड से है एवं जहाँ कमल का मूल है. इसे अध्यात्म जगत 'संसार' संकेत करता है . कमल नाल जल की तरलता, उसकी शीतलता में रहता है. यह तरल माध्यम ही ईश्वर की करुणा उसकी कृपा और उसकी असीम सत्ता है . जल की तरलता ईश्वर का आलंबन है. जल की सतह पर पुष्प और पत्र स्थित रहते हैं . समग्र रूप से देखें तो कमल तीन अलग अलग माध्यमों रहते हुए जीवंत रहता है. पत्र और पुष्प बाह्य जगत में कमल का दृष्टव्य रूप है. इसीलिए मैं कहता हूं कमल उस सृष्टिकर्ता की अप्रतिम कृति है. माँ भगवती कमलासना है. भगवान के दिव्या स्वरुप का जब मनोहारी रूप वर्णन किया जाता है तो सरोज, कमल, इत्यादि से उपमान दिया जाता है. कमल का पुष्प और पत्र भाग का यहाँ आश्रय ले कर हम कुछ समझने का प्रयत्न करेंगें . इन अवयवों पर जब जल की बूँदें पड़ती है तो वह इसे यथावत धारण करता हें जो अलग भी नहीं है और अलग भी है, लिप्त नहीं है.
प्रसंग है_ कुरुक्षेत्र में सेना युद्ध के लिए उद्यत हो कर खड़ी है अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा दोनों सेनाओं के बीच रथ को ले चलो. सारथि ने वैसा ही किया. अर्जुन ने देखा युद्ध में उपस्थित दोनों पक्षों में जो थे वे सब अपने या अपनों में से ही है. अर्जुन विमोहित हुआ उसके हाथ से गांडीव गिर गया. युद्ध सारा वृत्तान्त सब को पता है. इस सन्दर्भ में एक श्लोक का पदांश याद अत है _"मामनुस्मर युध्य च ". यह पदांश अपने आप में एक जीवन दर्शन समेटे है. गीता ईश्वर की असीम सत्ता, ईश्वर का सत्य स्वरुप, ईश्वर की करुणा का आभास कराती है एवं उसी समय कर्म का पाठ भी पढ़ाती है, मानव जीवन को जीने की कला सिखाती है, जीवन के यथार्थ बोध साथ ईश्वर की स्मृति का संयोग कराती है. मनुष्य यदि कमल के जीवन को अपने जीवन में व्याहृत करे तो समस्त सम- विषम परिस्थितियों में सम रह कर अकम्पित जीवन जी सकता है
जीवन की सफलता का भौतिक मापदंड वस्तुतः वास्तविक मानदंड नहीं है वरन अपना कर्म करने के साथ साथ अध्यात्म का आश्रय पाना , ईश्वर की सत्ता की अनुभूति करना, उनकी कृपा में रहना, तथा उनके प्रति कृतज्ञ होना है. समस्त धर्मानुरागी एवं विद्वद्जनों से मैं क्षमा प्रार्थी हूं , मैं इस संदर्भ की व्याख्या अपने अपरिपक्व अनुभव से कर रहा हूँ
कहते हैं - "नजर बदली तो नज़ारे बदल जाते हैं, थोड़े नहीं सारे बदल जाते हैं ." गीता भगवान के श्रीमुख से निस्रत हुई इसलिए तर्कों से परे है, संशय के योग्य नहीं है. 'श्रद्धावान्लाभ्तेज्ञान ' इसलिए जिसकी जैसी नजर,जिसकी जैसी श्रद्धा और जिसकी जैसी समझ इसे माना इसे जाना और इससे पाया. गीता का निरूपण महाभारत के रणांगन में हुआ. मेरे संज्ञान में इसे तीन व्यक्तियों ने सुना. एक अर्जुन ने जो कृष्ण का सखा है, उसने सखा रूप में भगवान कृष्ण को स्वीकार कर समर्पण भाव से सुना. उसे ज्ञान एवं ब्रह्मविद्या का श्रवण करते हुए परम पुरुष के विराट स्वरुप दर्शन किया . गीता के श्रवण करके उसका मोह भंग हुआ. अपने कर्म में श्रद्धा से तत्पर हुआ और अंत में विजय श्री और यश प्राप्त किया . दूसरा संजय ने सुना, जिसने भगवान वेदव्यास की कृपा से दिव्य दृष्टि से देखा सुना. इसने यथा रूप राजा ध्रतराष्ट्र को सुनाया, संजय ने माध्यम हो कर इस पुण्य दायिनी, मोक्ष दायनी गीता को ध्रतराष्ट्र तक पहुँचाया. क्योकि इसे संजय ने हस्तांतरित किया था जसे अंजलि में सुगन्धित पुष्पों के छूने से शुची सुगंध रह जाती है उसी प्रकार ईस्वर की उसे कृपा प्राप्त हुई. गीता के ह्रदय से श्रवण करने पर उसे ज्ञान तो मिला ही वह त्रिकालग्य हुआ. गीता के अंतिम श्लोक में स्वयम संजय ने निश्चयात्मक अधिघोष्णा की.- "यत्र योगेश्वरो कृष्ण: यात्रा पार्थो धर्नुधर: तत्र श्रीर्विजय: भूति: नीतिर्मतिर्मम. " इसे मैं उद्घोषणा इस कारन से कह रहा हूँ क्योंकी युद्ध आरम्भ होने के पूर्व ही युद्ध अर्थत कर्म फल की परिणीती स्पष्ट कर दी थी. इसके प्रतिकूल राजा ध्रतराष्ट्र ने पूरे संवाद में केवल छिद्रान्वेषण ही किया. उसने भगवन के सर्वव्यापक स्वरुप को अनुभूत नहीं किया क्योंकि उसमें समर्पण, परमार्थ और जन कल्याण की भावना का सर्वथा अभाव था. सत्य है निम्ब के वृक्ष के जड़ में मधु का सिंचन करने पर भी उसमे मिठास नहीं आती है. इस परम पवित्र गीता की स्रोतस्विनी आज तक इस संसार में बह रही है और हमारे कल्याण के हेतु से विद्यमान है.
'नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन
यमेवैष वृणुते तें तें लभ्यः तस्यैष आत्मा वृणुते तनुं स्वाम.
यह परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से न बुद्धि से, और न ही बहुत सुनने से ही प्राप्त होता है. जो परमात्मा को स्वीकार कर लेता है वह परमात्मा को प्राप्त करता है और परमात्मा उसके सामने स्वयं प्रकट कर देता है.
ईशावाश्योप्निषद में कहा है -
ईशावाश्यमिदम्सर्वं यात्किन्चिद्जगात्याम्जगत.
तेन त्यक्तेन भुन्जिथाम माँ गृधः कस्यस्विद्धनम .
अखिल ब्रह्माण्ड जो कुछ भी जड़ चेतन स्वरुप जगत हैयह समस्त ईश्वर से व्याप्त है. इस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्याग पूर्वक भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ.यह धन (भोगी पदार्थ ) किसका है? अर्थात किसी का नहीं.समस्त भौतिक पदार्थ उस परमात्मा का वैभव है हमारी धरोहर नहीं.उसकी सत्ता का अनुभव करोऔर उसका यथोचित उपभोग करो. मत भूलो उस सृष्टिकर्ता ने जिस सृष्टि की रचना की तुम उसके अवयव . न तुम सृष्टि से अलग हो न सृष्टि तुम से अलग है. वह परमात्मा समरूप से सब में विद्यमान है और यह सम्पूर्ण भी उसमें ही अवस्थित है .
मानसकार कहता है- हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रगट होही मैं जाना
लेकिन _सोई जानई जेहू देई जनाई जानत तुम्हहि तुम्हहि होई जाई.
कहें तो उपरिलिखित तथ्यों को यदि किंचत मात्र भी जीवन में उतार लिया तो हमारे जीवन को जीने की सोच में विलक्षण अपरिवर्तन आ सकता है.
'मामनुस्मर युध्य च'- मैं इस पदांश में जीवन के अद्भुत दर्शन का संकेत अनुभव करता हूँ . यहाँ मैं पुनः कहना चाहूँगा की गीता में प्रयुक्त एक एक अक्षर सार्थक है. मामनुस्मर अर्थात मेरा अनुस्मरण कर. स्मरण याने स्मृति में रहना और अनु याने अनुगमन करना. अर्थात ईश्वर के सदैव चिंतन में रहना. श्लोक के पूर्वार्ध में कहा गया है कि 'तस्माद सर्वेषु कालेषु' याने बिना अवकाश के उस परमात्मा को अपनी स्मृति में रखना. इसके पश्चात् कहा है युध्य. यहाँ युध्य मनुष्य को उसके वर्णाश्रमधर्म के अनुरूप कर्म का बोध करता है. अब स्वतः स्पष्ट है कि मानव ईश्वर के निरंतर सत्ता बोध में रहता है तो उसे कर्म फल में आसक्ति नहीं होगी क्योंकि चित्त तो ईश्वर में प्रवृत्त है.इस स्थिति में समस्त किये गए कर्म परमात्मा को समर्पित हो जाते हैं. यदि हम उसमें समर्पण जगा सकें तो उसने हमारे लिये प्रतिज्ञा कर रखी है _ 'योग्क्षेम्वाहाम्यहम '. और माम अनुस्मर युध्य च का अंतिम अक्षर है च जिसका भाषानुवाद है और इस पद में दोनों उपयोगी उपदेशों के पश्चात च की आवश्यकता क्यों हो गई ? मुझे जहाँ तक समझ में आया _इस च में जीवन दर्शन छुपा है. 'मामनुस्मर' और 'युध्य' अलग अलग है . एक भाव है अनुस्मर और दूसरा भाव है कर्म रत रहना. प्रथम भाव आत्मा को परमात्मा से योग करता कराता है और दूसरे भाव में मनुष्य का जगत में विद्यमान होना होते हुए कर्मरत रहना. लेकिन 'च' अव्यय का प्रयोजन है दोनों भावों का सम्यक संयोजन. इसीलिए मैं कहता हूँ _गीता हमें ईश्वर में अनुरक्ति, उसके प्रति समर्पण, उस सर्वशक्तिमान का सर्व काल में सत्ता बोध रहने के साथ कर्म करते रहने का पाठ पढ़ाती है. अपने धर्मयुक्त नियत कर्म से पलायन का गीता में कोई स्थान नहीं .ईशावास्योनिशद के उद्घोष का यदि जीवन में लेशमात्र भी भाव तिरोहित हो जावे जगत में जो भी कर्म संपादन किया जाता है वह मनुष्य को आंतरिक आनंद से परिपूर्ण कर देता है .सार यह है कि ईश्वर भावना भावित कर्म रह कर कार्य करते रहना है न संसार को छोड़ना है न ईश्वर को छोड़ना है . जब दृष्टि बदल जाती है तो दृश्य बदल जाते हैं दृश्य वाही होता है दृश्य के भाव बदल जाते हैं . कर्म वही होता है जो नित्य करते हैं लेकिन कर्म के भाव बदल जाते हैं और कर्मफल उस परमसत्ता को समर्पित हो जाता हैं. ईश्वर अविनाशी वही चिरंतन सत्य है.संसार वाही होता है लेकिन जगत के प्राणीयों के प्रति व्यवहार बदल जाते हैं .हमारा जीवन वही रहता है लेकिन हमारे आचार बदल जाते हैं . जीवन के दर्शा एक वृहद् मीमांषा का विषय है गीता इस संपृक्त सूत्र जीवन को आनंद और उल्लासमय बनाए का सन्देश दिया है.गीता वास्तव में ईश्वर में अनुराग और जीवन का गीत है .
श्री कृष्णार्पणमस्तु .
निवेदक :रामनारायण सोनी
श्री कृष्णार्पणमस्तु .
निवेदक :रामनारायण सोनी
संक्षिप्त रामायण
जाको पढ़े पार हो जाई जगं में रामायण सुखदाई
बालकाण्ड हरी जन्म लियो है नर लीला फैलाई
जाई जनकपुर धनुष को तोडा ब्याहे चारों भाई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
अयोध्या कांड में मात पिता की आज्ञा शीश चढ़ाई
सिया सहित प्रभु वन को गए हैं राम लखन दोउ भाई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
अरण्य कांड में सीता हरण हुआ पंचवटी में जाई
पम्पापुर में मिले पवनसुत सुग्रीव से करी मिताई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
किष्किन्धा कांड में चार महीना वर्षा ऋतू बिताई
शरद ऋतू आते ही प्रभुजी सिया जी की खोज कराई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
सुन्दर कांड में लंका जलाई अक्षय को मार गिराई
मात सिया की खबर सुनाई कृपा सिन्धु रघुराई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
लंका कांड में सेतु बंध हुआ सेना पार लगाई
घोर संग्राम मच्यो लंका में जीत गए रघुराई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
उत्तर कांड में राज तिलक हुआ राज करे दोउ भाई
सिया सहित सिंहासन बैठे राम लखन दोउ भाई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
सात कांड जो नर पढ़े सुने मन और चित लाई
तुलसीदास आशा रघुवर की भाव सागर तर जाई
जाको पढ़े पार हो जाई ....
-: दुर्गा सोनी :-
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